रविवार, 15 जनवरी 2017

meri parnaani



परनानी 



वे मेरी पड़ नानी थी।  सामान्य मंझोला कद।  कुछ कुछ सांवला रंग , चेहरा साधारण सिवाए  बड़ी आँखों के आधे सफेद आधे काले बाल कुल मिला कर एक सामान्य भारतीय महिला पर इसके बावजूद कुछ तो था जो उन्हें भीड़ से अलग बनाता था।
 चेहरे पर एक अलौकिक तेज था जो देखने वाले को अभिभूत कर देता।  एकदम रिन  की चमकार वाली सफेद साड़ी ,बन्द गले का कुर्ती नुमा ब्लाउज उनकी पसन्दीदा पोशाक थी वे अक्सर इसी में नज़र आती। हाथ में तुलसी की माला लिपटी रहती और माथे पर चन्दन की गोल बिंदी।  मैंने जब भी उन्हें देखा इसी रूप में देखा।
   नौ साल की थी कि दुल्हन बन ससुराल आ गयी। उनके पति तब मैट्रिक कर  रहे थे खुद को पति के काबिल बनाने के लिए उन्होंने कुछ पति से सीखा तो कुछ सास से।  थोड़े ही दिनों में रामचरित मानस ,गीता ,भागवत का शुद्ध पाठ भी करने लगी और लगे हाथ आठवीं  की परीक्षा भी पास कर ली।  इस बीच पड़ नाना  स्टेशन मास्टर हो गए।  दिन ऐश से बीत रहे थे कि रेल हादसा हो गया रेल डिब्बा उलटने से दो लोगों की मौत हो गयी।  अंग्रेज सरकार का जमाना था , सजा में काले पानी की सजा मिली। वह  भी अफ्रीका के जंगल में .. नाना को जाना पड़ा।पीछे रह गई पड़नानी अपने दो लड़कों के साथ।  जितना पैसा हाथ में था उससे मुश्किल से पांच महीने निकले। उसके बाद गुजारे की समस्या सामने थी उनहोंने पर्दा उतार फैंक दिया  कमर कस ली किसी से मदद नहीं लेंगी न मायके से ,न ससुराल से।  घर के ठाकुर जी को ही अपना सहारा बनाया। और अपनी हँसुली बेच जन्माष्टमी का आयोजन किया झांकी सजा आस पास वालों को दर्शन के लिए आमन्त्रित किया।  लोगों ने दर्शन किये तो खो गए और लोग कहते हैं कि जन्माष्टमी के दिन तक तो कतारें लग गयी थी।  नानी भागवत बांचती तो लोग निहाल हो जाते।  बीच बीच में आज़ादी की जरुरत पर भी चर्चा होती। पर मुख्य ये कि बच्चों के खाने के साथ साथ उनकी इंटर तक की पढ़ाई भी हो गई।  इस तरह बारह बरस बीत गए।  और  एक दिन देश आज़ाद हो गया। साथ ही आई विभाजन की आंधी लोग धड़ाधड़ पाकिस्तान वाली धरती छोड़ हिंदूस्तान  आने  लगे नानी की हवेली जो अब अफ्रीका वालों की हवेली कही जाने लगी थी ,में सात परिवारों ने शरण ली थी जिनका एक महीने तक खर्च पड़नानी ने ही उठाया। इसी बीच अंग्रेज   सरकार ने अपने सभी आदेश वापिस लेकर कैदियों को रिहा कर दिया। पड़ नाना  अंग्रेज सरकार ने यह अधिकार दिया कि वे चाहे तो भारत लौट जाएँ अथवा तंजानिया में जहाँ उन्होंने जंगल साफ़ करवा कर  जमीन बनवाई  है वहां खेती कर सकते हैं। पड़ नाना ने अफ्रीका चुना और नानी को लेने भारत आये पर पड़नानी ने देश छोड़ने से इंकार कर दिया। पड़नाना बोझिल मन से बड़े बेटे को लेकर लौट गए पर पत्नी को नहीं मन सके।  इसके बाद वे हर साल भारत आते रहे।
पड़नानी एक सौ दस साल तक जीवित रही। एकदम स्वस्थ ,चैतन्य ,जिंदगी से भरपूर।  जो चोपड़ की महफ़िल उनहोंने बीस साल की उम्र में शुरू की थी वह उनके मरने वाले दिन तक तीन से पांच तक बदस्तूर जारी रही और ठाकुर जी पूजा आरती भी। एक दिन सन्ध्या आरती के बाद प्रसाद ग्रहण करके उनहोंने देह त्याग किया
पूरी जिंदगी जीवट से जीने वाली यह महिला क्या साधारण थी

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