बुआ ज्वाली नहीं रही। अचानक उनके स्वर्गवास की खबर मिली। हैरान करने वाली बात ये नहीं थी कि वे चली गई बल्कि ये कि उनका नाम ज्वाली नहीं था, ज्वाली उनका मायके का कस्बा था। वे इस मौहल्ले की बेटी नहीं बहु थी .उनका असली नाम उमा था। . पिछले पचास साल से बहु नहीं बेटी का रुतबा पाकर जिस घर में रह रही थी वह उनका ससुराल था जिसे सब भैयाजी कहते थे वे उनके पति थे।
एक साथ इतने सारे खुलासों ने दिमाग की दही जमा दी थी। सब कुछ सुन्न। मन एक भी बात पर विश्वास करने को तैयार ही नहीं था पर जब अर्थी पर आरूढ़ बुआ की मांग में सिंदूर डाल उन्हें घर से विदा किया गया तो अविश्वास का कोई कारण ही नहीं रह गया था।
बुआ की शादी चौदह साल की उम्र में भैयाजी से हुई और तीन साल बाद गौना। जब गौने के बाद वे ससुराल आई भैयाजी वकालत पढ़ रहे थे। बुआ घर के काम में बेहद कुशल ,सीना पिरोना , बुनाई सिलाई , लीपना पकाना राँधना हर काम वे जिस सफाई से करती देखने वाले देखते रह जाते। खाना परोसती तो खाने वाले उँगलियाँ चाटते रह जाते। सास ससुर की आँख का तारा थी उमा। पर बैरिस्टर पति को हरदम हल्दी मसाले से गंधाती अनपढ़ बीबी कभी पसन्द नहीं आई। उस पर खुदा का कहर कि शादी के आठ साल बाद भी वे माँ नहीं बन पाई। एक दिन सब को हैरान करते हुए भैयाजी ने अपनी स्टेनो से शादी कर गृह प्रवेश किया तो घर में कोहराम मच गया। बाबूजी की गालियां ,माताजी का रोना , पड़ोसियों का जमाने को गरियाना दो तीन महीने से कम तो क्या चला होगा। फिर धीरे धीरे सब सामान्य हो गया। नई दुल्हन भी घर का हिस्सा हो गई। इस सब में जो धरती जैसी अचल रही वो थी बुआ.. जैसे वह यह सब पहले से जानती थी जैसे यह तो होना ही था। उसी भाव से रसोई सम्भाले रही। सास जब तब गले लगा कर रो पड़ती। पगली सिर्फ चौबीस साल की उम्र में सौत का दुःख कैसे सहेगी कैसे कटेगी पहाड़ जैसी जिंदगी पर उमा की आँखों से एक बूँद भी टपकी हो मजाल है।
एक दिन खबर पा उमा के दोनों भाई आये तो उमा ने कुछ कहने से बरज दिया साथ जाने से भी इनकार कर दिए . दोनों भाई बैरंग लौट गए
उस दिन से उमा सास की बेटी हो गई अकेली सास नहीं पूरे मौहल्ले की बेटी हो गई और सब बच्चों की बुआ। की बहुएं आदर से बुआ कहती तो बुआ ज्वाली की आशीषों का दरिया बाह जाता। सब पर प्यार लुटाया। सब से आदर पाया ऐसी बुआ को देख कर भैयाजी को कभी ग्लानि हुई हो ,जान्ने का कोई साधन मेरे पास नहीं है
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