शुक्रवार, 20 जनवरी 2017

मेरी अध्यापिका थी . बिलकुल सादी वेशभूषा . बार्डर वाली सफेद साडी .जिसका बार्डर तो बदल जाता पर साडी वही रहती .मुड़ी तुड़ी , बिखरी सी . खिचड़ी बालों को कस कर लपेट कर दो सुइयां खोस लेती तो चेहरा और भी रोबदार लगता .हालात ने उन्हें उम्र से पहले बूढा बना दिया था . पर जब वे आँखें बंद कर पढाना शुरू करती तो अधिकांश मंत्रमुग्ध हो सुनते रहते .
सिलेबस की सभी कवितायें उन्हें कंठस्थ थी . व्याकरण उनकी जीभ की नोक पर धरा था . स्वभाव से एकदम कडक पर सब बच्चों की मदद करते भी मैंने उन्हें देखा है .जिस दिन नहीं आती उस दिन सब सूना रहता .
थोडा बड़े हुए तो जाना कि वे बनारस के किसी नामी वकील की चार बेटियों में से एक थी . उनके पति मैथ्स में पी एच डी थे और डिग्री कालेज में व्याख्याता .पर मैथ करते करते दिमागी संतुलन गंवा बैठे .अब शहर की सडकों में भटकते गणित की पहेलियाँ हल किया करते हैं . मायके और ससुराल के बहुत से लोगों ने समझाया कि तलाक लेकर नया घर बसा लो पर उनहोंने नहीं माना .स्कूल से छुटते ही खोजने निकल पड़ती है . और ढूढ़ कर जैसे तैसे घर लाकर नहलाना ,खिलाना सुलाना सब पूरी इमानदारी से साड़ी जिन्दगी निभाया उनहोंने . सुन कर मन श्रद्धा से भर उठा .आज के इस स्वार्थ के संसार में कोई इतना निस्वार्थ कैसे हो सकता है 

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