मेरी क्लास में सबसे पीछे की सीट जो एक कोने में रखी रहती हमेशा रिजर्व थी जहाँ बाकी सब लडकियाँ अपनी अपनी सीट के लिए भागती दौड़ती आती ,लेट होने पर अक्सर सीट छिन जाती , वहां वह कुर्सी हमेशा आने वाली का इन्तजार करती खाली पड़ी रहती . जब सब लड़कियां अपने बैग अपनी कुर्सी पर टिका कर प्रार्थना के लिए चली जाती ,तब वह डरते डरते क्लास में आती . चुपके से कुर्सी पर बैठ बस्ता गोद में लेती .उसके बाद तभी उठती जब छुट्टी होने पर सारी लड़कियां घर चली जाती . आधी छुट्टी में शारदा और शशि उसके लिए लायी रोटी जरूर उसे देने जाती . कक्षा परीक्षा में भी वह अपना लिखा खुद ही पद कर सुना देती और सुन कर दीदीजी नम्बर लगा लेती जबकि हमारी कापियां वे साथ ले जाती .एक एक अक्षर पढ़ती तब जा कर नम्बर मिलते और नम्बरों से ज्यादा डांट मिलना पक्का तो था ही .सो नौरती से ईर्ष्या तो बनती ही थी न . इसलिए मन ही मन उससे जलन होने लगी थी . हूँ क्या किस्मत है . न सीट की चिंता ,न टिफिन लाने की न कापियां जचवाने की मौज ही मौज है महारानी की
और एक दिन ये सब अपने से दो क्लास आगे वाली वीना दीदी को कह ही दिया तो उन्होंने कानों को हाथ लगा ईश्वर से माफ़ी माँगी . मुझसे भी आकाश की ओर हाथ जुडवा माफ़ी मंगवाई - पागल हुई हो क्या ? तभी ऐसी बातें सूझ रही हैं . कुछ जानती भी हो अरे वो मैला ढोते है न रमई और बिज्जू उनकी बेटी है नौरती . ये तो प्रधानजी इसकी फ़ीस भर रहे हैं .बड़ी दीदी इसको किताबे दिलाती हैं इसलिए स्कूल आ पाती है वर्ना माँ के साथ मैला ढो रही होती .
सचमुच उस दिन अपनेआप पर शर्म आई .घर आकर मैंने ठाकुर जी का धन्यवाद दिया माफ़ी मांगी नौरती के लिए कुछ पेन पेन्सिल निकाले और सुबह उसे देते हुए सौरी बोला तो वो हैरान परेशान हो गई .-
क्या हुआ ?
कुछ नहीं .ऐसे ही .
नौरती मेरे साथ आठवी तक रही उसके बाद उसका क्या हुआ जानने का कोई साधन नहीं है .पर अपनी कापी से पढ़ कर सुनाती वह मुझे आज भी सपने में दिख जाती है
और एक दिन ये सब अपने से दो क्लास आगे वाली वीना दीदी को कह ही दिया तो उन्होंने कानों को हाथ लगा ईश्वर से माफ़ी माँगी . मुझसे भी आकाश की ओर हाथ जुडवा माफ़ी मंगवाई - पागल हुई हो क्या ? तभी ऐसी बातें सूझ रही हैं . कुछ जानती भी हो अरे वो मैला ढोते है न रमई और बिज्जू उनकी बेटी है नौरती . ये तो प्रधानजी इसकी फ़ीस भर रहे हैं .बड़ी दीदी इसको किताबे दिलाती हैं इसलिए स्कूल आ पाती है वर्ना माँ के साथ मैला ढो रही होती .
सचमुच उस दिन अपनेआप पर शर्म आई .घर आकर मैंने ठाकुर जी का धन्यवाद दिया माफ़ी मांगी नौरती के लिए कुछ पेन पेन्सिल निकाले और सुबह उसे देते हुए सौरी बोला तो वो हैरान परेशान हो गई .-
क्या हुआ ?
कुछ नहीं .ऐसे ही .
नौरती मेरे साथ आठवी तक रही उसके बाद उसका क्या हुआ जानने का कोई साधन नहीं है .पर अपनी कापी से पढ़ कर सुनाती वह मुझे आज भी सपने में दिख जाती है
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