उनको जब मैंने देखा ,तब वे उम्र के उस मोड़ पर थीं जब पत्ते पीले पड़ने की ,नदी किनारे का पेड़ होने की बात कहना शुरू हो जाता है। उनसे मेरा परिचय कराते बड़ी भाभी ने कहा - ये हमारी मामी है और मैंने झुक उनके पैर छू लिए थे। जवाब में ढेर सा आशीर्वाद मिला था और साथ ही मिली थी खजूर। कुछ अजीब सा लगा था। यह पहला घर था जहाँ किसी ने न पानी पूछा था न चाय। पर बिना कुछ पूछे रह गई थी। लेकिन शंका का आधा समाधान बाहर आते ही जीतो चाची ने कर दिया था -' मुगलानी मामी से मिल के आ रही हो। "
' जी चाची '
ये कहानी तो मजेदार हो चली थी सो दो दिन बाद ही मैं बहाने से मामी के आंगन में पहुँच गई थी। मामी मिलके बहुत खुश हुई थी पर मुगलानी की कहानी पर चुप लगा गई - " ऐसे ही कह लेते है लोग मजाक मजाक में। मेरा नाम तो जनको है बिटिया जो तेरी नानी लेती थी। तेरे मामे ने तो वैसे ही सार लिया बिना नाम लिए। अब तो ऊपर बैठा पछता रहा होगा के एक बार भी नाम नहीं लिया।" मामी के झुर्रियों भरे चेहरे पर केसर बिखर गया पर पहेली अनसुलझी रह गई।
फिर एक दिन बातों बातों में पता चला कि जब रौले पड़े थे (विभाजन ) तब दोनों तरफ बड़ा कत्लेआम हुआ था हर गांव से ढूंढ कर विधर्मी मारे जा रहे थे पाकिस्तान में भी और हिन्दोस्तान में भी। उधर जितने मारे जाते इधर भी उतने जाते। एक जूनून सा सवार था लोगों पर हवा दे रहे थे नेता। उसी पागलपन का शिकार यह छोटा सा शहर भी हुआ था। जब एक ट्र्क भरा लाशों का इस शहर पहुंचा था बदले में शहर के सिख और जट्ट भी नँगी किरपानें लेकर सड़कों पर उतर आये। लाशों के ढेर लग गए। उन्हीं में से एक था जुनैद का परिवार। उसके अब्बू ,अम्मी ,खाला ,फूफी ,दोनों भाई सब मार दिए गए थे। जुनैद एक चारे की भरी के पीछे छिपी थी वहीँ बेहोश हो गई थी। उसी जुनूनी भीड़ में था राम मामा जो तब मुश्किल से बीस साल का था उस तेरह साल की खूबसूरत सी ,मासूम सी बच्ची की खूबसूरती ने कील लिया था और वह चिल्लाया था -न ओये इसनूं नहीं "
सारे उस माहौल में भी हँस पड़े थे। करतारे ताये ने कहा था - जा ओये ! तैनू दिती।
राम जुनेद को घर ले आया था माँ ने उसे गंगा जल से नहला के जानकी लिया और इस तरह जनको बन गई जानकी जो धीरे धीरे गीता पाठ भी सीख गई और रामायण पढ़ना भी। मुगलानी मामी भी कहलाई पूरी वफ़ादारी के साथ।
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