शनिवार, 11 फ़रवरी 2017


गर्मी का महीना . जून के अलसाए दिन . उस पर स्कूल की छुट्टियाँ . यानि एक करेला दूजे नीम चढ़ा . मन चाहता -तितली की तरह मस्त हो अमराई में घूमूं और खट्टी खट्टी कैरियां चुन चुन के खाऊ . पर माँ की आग्नेय आँखों की आंच झेलने की हिम्मत इस नन्हीं सी जान में कहाँ थी .मन मार कर तकिये में सर घुसाए निस्पंद लेटी थी . लेकिन मन था की पंखे की तरह लगातार चक्कर काट रहा था .
अचानक अलमारी खुलने की आहट हुई .चोर आँख से देखा -माँ श्रृंगार मेज के सामने खड़ी अपनी साडी की भंज जमा रही थी . हूँ …...... हमें तो ….लू लग जायेगी बेटे ….बाहर नहीं निकलना . खुद कहाँ जा रही हैं . मैंने मन ही मन इस नजर बंदी से फरार होने की योजना बना ली .
तभी बाहर पास ही शंख और घड़ियाल बजने का कोलाहल सुनाई दिया .माँ बाथरूम चप्पल में ही साडी के पल्ले से सर ढकती बाहर के गेट पर लपकी .पीछे पीछे में .
बाहर गली का दृश्य अनोखा ही वातावरण सृजन कर रहा था . सावित्री दी ने सर से पाँव तक सफ़ेद कपड़े पहने थे . हमेशा स्कर्ट या जींस में घूमने वाली सत्तो दी सूती सफेद चुन्नी में सर लपेटे अजूबा लग रही थी . लोग लपक लपक कर उनके पैर छूने की कोशिश कर रहे थे . सारे माधो नगर ,तिलक नगर और गढ़ी के लोगों में होड़ लगी थी - कौन पहले चरण स्पर्श करेगा और मोक्ष पहले कौन पायेगा . किन्ही स्वामी जी की जय जयकार के साथ सावित्री दी की जय वातावरण को गूंजा रही थी . सत्तो दी इस सब से निर्विकार आकाश में न जाने क्या ढूंढ रही थी .
भगवे वस्त्रो में आच्छादित कुछ साध्वियों ने भीड़ को एक तरफ हटने का संकेत दिया .भीड़ एक मिनट में दोनों हाथ जोड़ कर सडक के दोनों ओर खड़ी हो गई . सत्तो दी को खुली जीप में बिठा दिया गया .भीड़ ने गेंदे और गुलाब की वर्षा की . शंख बजे .जय घोष आकाश गूंजा गया जीप चल पड़ी साथ ही उन्मादी भीड़ भी जयकारे लगाती आगे आगे चली .माँ ने अपनी जगह खड़े ही प्रणाम मुद्रा में हाथ माथे से छुहाये .माँनो बहती गंगा में स्नान किया .
मैंने माँ का हाथ खींचते हुए पूछा - माँ ! आज सतो दी का ब्याह है ? “ हट पगली कही की " माँ ने हल्की चपत लगाई और ईश्वर से मेरे इस अपराध की क्षमा मांग ली . तेरी सत्तो दी तो साध्वी बन गई री . शादी ब्याह जन्म मरण से बहुत उपर उठ गई हैं . “
मेरी कुछ समझ नही आया . में तोशी के पास गई .तोशी !! दीदी जीप में बैठके कहाँ चली गई .तोशी की आँखे रो रो कर लाल हो गई थी - दी अब घर कभी नहीं आएगी . वो आश्रम चली गई . "
"आश्रम क्यों "
वे सन्यासिन हो गई हैं
पर दी की तो शादी होने वाली थी न .:
शादी कहाँ ? जहाँ भी बात चली हमेशा लेन देन पर आकर अटक गयी .कुछ दिन बाद लडके वालों की चिट्ठी आ जाती .लडकी की कुंडली नहीं मिल रही .पांच बार रिश्ता होते होते रह गया . “
पर दी को तो सर्वंन पसंद था न .अब तो कालिज में पढ़ाने भी लग गया है .उसकी माँ खुद रिश्ता लेके आई थी न "
उसके लिए न ताउजी माने न पापा . यादव था न फिर शर्मा की बेटी से शादी कैसे होती .ताऊ जी ने माँ -बेटे की बेज्जती करके घर से निकाल दिया .
साध्वी बनने का फैसला दी ने लिया था .माँ बहुत रोई .पापा ने समझाया .फिर हामी भर दी . पिछले पन्द्रह दिन से तैयारी चल रही थी .कल भगवन से दी की शादी है .

शादी या ? -मुझे अब भी कुछ समझ नहीं आ रहा .  

गुरुवार, 9 फ़रवरी 2017



सुमन की माँ दो कोठी में काम करती है . सुमन और उसके दोनों भाई सुबह होते ही सड़क पर कचरा बीनने आते है .सुबह क्या मुंह अँधेरे ही निकलते हैं . घंटाघर की घड़ी तब साढ़े चार या हद से हद पांच बज रहे होते हैं . सड़क पर गिरी बोतलें ,खाली डिब्बे गत्ते के कार्टन ,सब सधे हाथों से साथ के बोरे में समाते चले जाते है .हाथ तेज ,नजरें उससे भी तेज चल रही होती हैं .जितनी जल्दी चुना जा सके उतना अच्छा . ठीक छह बजते ही झाड़ू देने वाले माँ बेटा आ जायेंगे .फिर उन्हें घर लौटना होगा क्योंकि उसके बाद के सारे कचरे पर गोबिंद का हक हो जाता है . कचरे का बोरा लेकर वे कबाड़ी मोहन के डेरे पर जाते है .उस दिन का सामान ढेर कर सवालिया नजरों से मोहन को देखते है .मोहन तराजू पर तौलता है और कुछ रूपये उनके हाथ पर रख देता है .रूपये लेकर बच्चे रौनक की दूकान पर जाते है .दाल चावल या आटा जो मिल जाए जितना मिल जाए लेकर घर झुग्गी में लौटते है चूल्हा जलता है खाना बनता है थोडा थोडा खाकर बच्चे स्कुल चले जाते हैं . यह उनका रोज़ का नियम है .सर्दी गर्मी बरसात कभी कोई फर्क नहीं . फर्क सिर्फ इतना कि आज सुमन ने कबाड़ी के पास मेडिकल की किताबे देखी तो मांग ली और गजब ये कि कंजूस मोहन ने बिना कोई किन्तु परन्तु के वे सारी किताबें सुमन को दे भी दी हैं .सुमन उन किताबों को गले लगाये झुग्गी में जगमगाती आँखों में जगमगाते सपने सजाये बिलकुल उसी प्रकार बैठी है जैसे ग्यारहवी में मेडिकल सब्जेक्ट लेने के बाद बैठी थी . डाक्टर तो बनना ही है . चाहे साड़ी रात मोमबत्ती की रौशनी में पढना पड़े . जागती आँखों के सपने सुना है अवश्य पूरे होते हैं 

सोमवार, 6 फ़रवरी 2017



  नरेंद्र कौर , हाँ यही नाम था उसका।  मोटी तो नहीं  पर गुथें  बदन की मालकिन नरेंद्र कौर।  कोई नाम छोटा कर बुलाने की कोशिश करता तो गुस्से से जलता अंगारा हो जाती। दो भाइयों की इकलौती बहन , माँ बाप से ज्यादा दादा दादी की लाडली।
पढ़ाई में बहुत अच्छे में तो नहीं पर गुजारे लायक नम्बर आ ही जाते।  बारहवीं में अंग्रेजी में सबसे ज्यादा नम्बर आये तो पक्का हो गया कि अंग्रेजी ही पढ़ानी है बड़े होकर।  एक दिन बी ए , बी एड करके सरकारी स्कूल में भैन जी हो गई।
  घर में पहली तनख्वाह के पच्चीस सौ आये तो नरेंद्र कौर की शादी का जिक्र भी शुरू हुआ।  पहला रिश्ता आया लड़का बैंक में नौकर था। पर बात सिरे न चढ़ी ।  लड़का नरेंद्र को पसन्द ही नहीं आया . बोली - कैसे चपर चपर खाता है और हंसता तो पूरा मुँह खोल के है . मैंने नई करना इससे ब्याह।  घर वाले बोले कोई बात नहीं।  रिश्तों की क्या कमी हमारी नरेंद्र कौर को। एक रिश्ता आता एक रिश्ता जाता। कोई लड़का काल था। कोई लम्बा नहीं था और एक लड़का तो इसलिए नापसन्द हो गया कि उसने पहला सेंटेंस जो बोला कितना गलत था।  फिर एक दिन सुरेंदर को एक लड़का कुछ कुछ ठीक सा लगा तो लड़के ने कद कम होने की बात कह के रिश्ते से मन कर दिया 
दादी ने बात सम्भालने की कोशिश भी की। कम कहाँ जी पूरे पंज फुट तिन इंच है जी कद। पर लड़के  का कद था  छः फुट।  सो इस बार भी बात बनते बनते रह गई।
धीरे धीरे साल बीत ते गए।  नरेंद्र कौर बत्तीस पार  कर गई ।  रिश्तों की तलाश और तेजी से शुरू हुई। अब रिश्तेदारों ने विधुर और तलाक शुदा पुरुषों के रिश्ते जुटाने शुरू किये क्योंकि इस उम्र तक का कोई लड़का कुंवारा बिरादरी में मिलना तो असम्भव ही था।  करते करते जब सैंतीस भी पार हो गए तो माँ बाप की बैचैनी बढ़ी।  पर एक दिन स्वयम नरेंद्र कौर ने  इस सारी प्रक्रिया पर रोक लगा कर अध्याय को हमेशा हमेशा के लिए बन्द कर दिया।  उसने दो गरीब बच्चों की देखभाल और शिक्षा का सारा जिम्मा लेकर उनकी जिंदगी सँवारने का जिम्मा लिया है।  

बुधवार, 1 फ़रवरी 2017

मजनू आजकल रिक्शा चलाता है . जो कमाता है शराब और गुटके की पुड़िया में उड़ा देता है . उसकी मेहरारू बिशनसिंह की मेहरारू कहलाती है .यही पक्का नाम है मजनू का . एकदम छुईमुई सी पतली दुबली अगर बच्चों की पलटन साथ न हो तो कोई मान ही नहीं सकता कि वह पांच बच्चों की माँ है . कितने बरस की हो के सवाल पर वो उँगलियों पर गिनने का उपक्रम करती है -एक ठो पांच बीसी तो हो गए दीदी जी . सिर्फ पच्चीस साल , जी दीदी जी सलमान का बाप ठहरा मौसे कोई दसेक बरिस बड़े . तो उ ठहरे पैतीस क .नसा ने खा लिए . . तू रोकती नहीं .वह मुस्कराई थी .खर्च कैसा चलता है -दो ठो देवर है गाँव के ओही खर्चा चलावत है सगरा . वह मानवती मुझे अनुत्तरित कर चली गई .

रविवार, 29 जनवरी 2017




 पत्थर 




सुस्मिता  की माँ का देहांत जिन हालात में हुआ कोई भी दहल सकता था। फिर सुस्मिता का तो कहना ही क्या ?
उसकी माँ ने रात के दो बजे घर के बाहर बने पर्दे वाले बिना छत के गुसलखाने में आग लगा कर आत्महत्या कर ली थी।  माँ की चीखें देर तक हवा में गूंजती रही थी पर माँ दो मिनट में ही राख के ढेर में बदल गई।  सोये लोग हड़बड़ा कर उनके घर के आंगन की ओर  भागे थे।  जगह जगह झुण्ड बना कर चर्चा में लीन थे।
 दुबली पतली सी ,साँवली सलोनी, एकदम से शान्त ,मीरा ऐसा कैसे कर सकती है।  सब सोच में पड़े थे। उसके बाद कोई नहीं सोया था।
 दो घंटे बाद पुलिस आई थी।  ब्यान हुए।  सास ने कहा -जिस दिन से छोटी बेटी हुई उसी दिन से गुमसुम रहती थी जी हम तो बहुत समझाते थे पर गम को दिल से लगा ये  कारा कर गई।  "
पति ने भी अपने बयान में कहा - मुझसे तो खुल के बात ही नहीं की।  नहीं तो मैं ऐसा करने देता " .
 पुलिस अपनी कागजी कार्यवाही निपटा के मुट्ठी गर्म करवा जा रही थी कि छोटी निष्ठा चिल्लाई।_ "   पापा ने कल भी मारा। परसों भी। "
 इंस्पेक्टर ने जाते जाते पीछे मुड़ कर देखा तो अमरीक दोहरा हो गया। - "  बच्ची है जी घबराई पड़ी है।   "
 दादी निष्ठा को लगभग घसीटते अंदर स्टोर में ले गई थी - " चुप बिलकुल चुप ! माँ तो गई। बाप को जेल भेजना चाहती है तू। दोबारा अवा तवा बोली तो गला घोट के रख दूँगी। समझी। "
लोग धीरे धीरे घर लौट गए थे।  बात थम सी गई थी कि एकदिन सुस्मिता मौका देखते ही बाहर आ सीधे गली में बैठी औरतों के गोल में घुसी।  बिना सांस लिए बोली -  " माँ मामा के घर नहीं जा रही थी न तो पापा  ने रात को बहुत मारा  था।  माँ रोते रोते सूसू करने गई। बड़ी देर वापस ही नहीं आई तो पापा  ने तेल डाल के तीली भी फैंक दी थी आग लग गई थी जोर की।  माँ मर गई। "
भल्लाइँन ने सुस्मिता को लगभग साथ भींच लिया था - " न मेरी बच्ची ऐसी बात नहीं करते।  तेरी दादी या बाप ने सुन लिया तो मारेंगे तुझे। हमारे साथ लड़ाई होगी वो अलग।  किसी से   मत कहियो बच्ची "
लेकिन अगले ही दिन सुस्मिता  की  बात की पुष्टि हो गई जब अमरीक एक बच्चे समेत एक औरत को  घर ले आया।  शादी तो दो साल पहले किसी मन्दिर में कर चूका था।  घर लाना बाकी था वह भी हो गया।
अमरीक की माँ ने इस बहु का स्वागत सादगी से ही किया था।  दोनों बेटियां चुपचाप देखती रही थी।   बाप से तो पहले ही सम्वाद कम था।  अब खत्म सा हो गया।
सास ने मौहल्ले को खबर दी थी इन शब्दों में - बेचारा मर्द।  क्या करता बेचारा।  दो बेटियां जन दी थी। बेटा तो चाहिए था न।  हमने तो बथेरा कहा .  भई तू भी रह आराम से वो भी रहेगी। मानी ही नहीं मर के सुखी हो गई "
अब ये पत्थर हमे ही  सम्भालने है।"
 और अगले दिन ही चौदह साल की सुस्मिता  किसी  रिक्शावाले के साथ भाग गई।  मरनेवाली का गन्दा खून जो थी। पत्थर थी पत्थर।

गुरुवार, 26 जनवरी 2017

राखी के घर से अक्सर उसके माँ और पिताजी की लड़ाई की ख़बरें आती रहती . सामान्य बहस से शुरू हुई बात पिताजी द्वारा मारपीट ,माँ के रोने धोने तक पहुँच जाती . पिताजी अंत में बाहर निकल जाते .तो माँ का गरियाना शुरू हो जाता - ये लड़की तो सौत है सौत . सुन कर हैरानी होती कोई बेटी माँ की अपनी माँ की सौत ? ऐसा गजब भी कहीं हुआ है ?
एक दिन राखी घर आई तो मैंने प्रश्न की नजरों से देखा -
राखी ने जो उत्तर दिया वह तो और भी हैरान करने वाला था - ये औरत तो है ही इसी काबिल . आने दे पिताजी को बता दूँगी इसने सारा दूध उबाल दिया दूध साफ़ करने लगी तो चीनी का डिब्बा भी उल्टा दिया .
फिर ?
फिर क्या पिताजी फिर पीटेंगे . मज़ा आएगा .
ऐसा ?
हाँ मै तो रोज ही करती हूँ .जिस दिन बिना बात डांटती है , उस दिन तो दो बार . कभी तो सुधरेगी .
माँ ने राखी को डांट के भगा दिया था मुझे हिदायत मिली थी ऐसी बदतमीज लडकी से दूर रहने की .
माँ राम राम कहती अन्दर चली गयी थी .दादी को कह रही थी - लड़की बिगाड़ दी दादी ने . शुरू शुरू में अपनी बात को सही करने के लिए इस लडकी को गवाह बनाती थी ताकि मियां बीबी में झगड़ा करवा सके . अब दादी मर गई तो पोती ने राम कटोरी का जीना दूभर कर रखा है भला ऐसी भी होती है बेटियां ?
दादी ने पता नही क्या कहा क्या नहीं ?
पर राम कटोरी के रोने की आवाज अब तक आ रही थी 



मंगलवार, 24 जनवरी 2017


बुआ ज्वाली नहीं रही।  अचानक उनके स्वर्गवास की खबर मिली।  हैरान करने वाली बात ये नहीं थी कि वे चली गई बल्कि ये कि उनका नाम ज्वाली नहीं था, ज्वाली उनका मायके का कस्बा था।  वे इस मौहल्ले की  बेटी नहीं  बहु थी  .उनका असली नाम उमा था।   .  पिछले पचास साल  से   बहु  नहीं बेटी का रुतबा पाकर जिस घर में रह रही थी  वह उनका ससुराल  था जिसे सब भैयाजी कहते थे वे उनके पति थे।
एक साथ इतने सारे खुलासों ने दिमाग की दही जमा दी थी।  सब कुछ सुन्न। मन एक भी बात पर विश्वास करने को तैयार ही नहीं था पर जब अर्थी पर आरूढ़ बुआ की मांग में सिंदूर डाल उन्हें घर से विदा किया गया तो अविश्वास का कोई कारण ही नहीं रह गया था।
बुआ की शादी चौदह साल की उम्र में भैयाजी से हुई और तीन साल बाद गौना।  जब गौने के बाद वे ससुराल आई भैयाजी वकालत पढ़ रहे थे।  बुआ घर के काम में बेहद कुशल ,सीना  पिरोना , बुनाई सिलाई , लीपना  पकाना राँधना हर काम वे जिस सफाई से करती देखने वाले देखते रह जाते।  खाना परोसती तो खाने वाले उँगलियाँ चाटते रह जाते।  सास ससुर की आँख का तारा थी उमा। पर बैरिस्टर  पति को हरदम  हल्दी  मसाले से गंधाती अनपढ़ बीबी कभी पसन्द नहीं आई। उस  पर  खुदा का कहर कि शादी के आठ साल बाद भी वे माँ नहीं बन पाई।  एक दिन  सब को हैरान करते हुए भैयाजी ने अपनी स्टेनो से शादी  कर गृह प्रवेश किया तो घर में कोहराम मच गया।  बाबूजी की गालियां ,माताजी का रोना , पड़ोसियों का जमाने को गरियाना दो तीन महीने से कम तो क्या चला होगा।  फिर धीरे धीरे सब सामान्य हो गया। नई दुल्हन भी घर का हिस्सा हो गई। इस सब में जो धरती जैसी अचल रही वो थी बुआ..  जैसे   वह यह सब पहले से जानती   थी  जैसे यह तो होना ही था।  उसी भाव से रसोई सम्भाले रही।  सास जब तब गले लगा कर रो पड़ती। पगली सिर्फ चौबीस साल की उम्र में सौत का दुःख कैसे सहेगी कैसे कटेगी पहाड़ जैसी जिंदगी पर उमा की आँखों से एक बूँद भी टपकी हो मजाल है।
एक दिन खबर पा उमा के  दोनों भाई आये तो उमा ने कुछ कहने से बरज दिया साथ जाने से भी इनकार कर दिए  . दोनों भाई बैरंग लौट गए
उस दिन से उमा सास की बेटी हो गई अकेली सास  नहीं पूरे मौहल्ले की बेटी हो गई और सब बच्चों की बुआ।  की बहुएं आदर से बुआ कहती तो बुआ ज्वाली की आशीषों का दरिया बाह जाता।  सब पर प्यार लुटाया।  सब से आदर पाया  ऐसी बुआ को देख कर भैयाजी को कभी ग्लानि हुई हो ,जान्ने का कोई साधन मेरे पास नहीं है