गर्मी का
महीना . जून
के अलसाए दिन .
उस पर स्कूल की
छुट्टियाँ .
यानि एक करेला दूजे
नीम चढ़ा . मन
चाहता -तितली
की तरह मस्त हो अमराई में घूमूं
और खट्टी खट्टी कैरियां चुन
चुन के खाऊ .
पर माँ की आग्नेय
आँखों की आंच झेलने की हिम्मत
इस नन्हीं सी जान में कहाँ थी
.मन
मार कर तकिये में सर घुसाए
निस्पंद लेटी थी .
लेकिन मन था की पंखे
की तरह लगातार चक्कर काट रहा
था .
अचानक
अलमारी खुलने की आहट हुई .चोर
आँख से देखा -माँ
श्रृंगार मेज के सामने खड़ी
अपनी साडी की भंज जमा रही थी
. हूँ
…...... हमें
तो ….लू
लग जायेगी बेटे ….बाहर
नहीं निकलना .
खुद कहाँ जा रही हैं
. मैंने
मन ही मन इस नजर बंदी से फरार
होने की योजना बना ली .
तभी बाहर
पास ही शंख और घड़ियाल बजने का
कोलाहल सुनाई दिया .माँ
बाथरूम चप्पल में ही साडी के
पल्ले से सर ढकती बाहर के गेट
पर लपकी .पीछे
पीछे में .
बाहर गली
का दृश्य अनोखा ही वातावरण
सृजन कर रहा था .
सावित्री दी ने सर
से पाँव तक सफ़ेद कपड़े पहने थे
. हमेशा
स्कर्ट या जींस में घूमने वाली
सत्तो दी सूती सफेद चुन्नी
में सर लपेटे अजूबा लग रही थी
. लोग
लपक लपक कर उनके पैर छूने की
कोशिश कर रहे थे .
सारे माधो नगर ,तिलक
नगर और गढ़ी के लोगों में होड़
लगी थी - कौन
पहले चरण स्पर्श करेगा और
मोक्ष पहले कौन पायेगा .
किन्ही स्वामी जी
की जय जयकार के साथ सावित्री
दी की जय वातावरण को गूंजा रही
थी . सत्तो
दी इस सब से निर्विकार आकाश
में न जाने क्या ढूंढ रही थी
.
भगवे
वस्त्रो में आच्छादित कुछ
साध्वियों ने भीड़ को एक तरफ
हटने का संकेत दिया .भीड़
एक मिनट में दोनों हाथ जोड़ कर
सडक के दोनों ओर खड़ी हो गई .
सत्तो दी को खुली
जीप में बिठा दिया गया .भीड़
ने गेंदे और गुलाब की वर्षा
की . शंख
बजे .जय
घोष आकाश गूंजा गया जीप चल पड़ी
साथ ही उन्मादी भीड़ भी जयकारे
लगाती आगे आगे चली .माँ
ने अपनी जगह खड़े ही प्रणाम
मुद्रा में हाथ माथे से छुहाये
.माँनो
बहती गंगा में स्नान किया .
मैंने माँ
का हाथ खींचते हुए पूछा -
माँ !
आज सतो दी का ब्याह
है ? “ हट
पगली कही की "
माँ ने हल्की चपत
लगाई और ईश्वर से मेरे इस अपराध
की क्षमा मांग ली .
तेरी सत्तो दी तो
साध्वी बन गई री .
शादी ब्याह जन्म
मरण से बहुत उपर उठ गई हैं .
“
मेरी कुछ
समझ नही आया .
में तोशी के पास गई
.तोशी
!! दीदी
जीप में बैठके कहाँ चली गई
.तोशी
की आँखे रो रो कर लाल हो गई थी
- दी
अब घर कभी नहीं आएगी .
वो आश्रम चली गई .
"
"आश्रम
क्यों "
वे सन्यासिन
हो गई हैं
पर दी की
तो शादी होने वाली थी न .:
शादी कहाँ
? जहाँ
भी बात चली हमेशा लेन देन पर
आकर अटक गयी .कुछ
दिन बाद लडके वालों की चिट्ठी
आ जाती .लडकी
की कुंडली नहीं मिल रही .पांच
बार रिश्ता होते होते रह गया
. “
पर दी को
तो सर्वंन पसंद था न .अब
तो कालिज में पढ़ाने भी लग गया
है .उसकी
माँ खुद रिश्ता लेके आई थी न
"
उसके लिए
न ताउजी माने न पापा .
यादव था न फिर शर्मा
की बेटी से शादी कैसे होती
.ताऊ
जी ने माँ -बेटे
की बेज्जती करके घर से निकाल
दिया .
साध्वी
बनने का फैसला दी ने लिया था
.माँ
बहुत रोई .पापा
ने समझाया .फिर
हामी भर दी .
पिछले पन्द्रह दिन
से तैयारी चल रही थी .कल
भगवन से दी की शादी है .
शादी या
? -मुझे
अब भी कुछ समझ नहीं आ रहा .
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