गुरुवार, 9 फ़रवरी 2017



सुमन की माँ दो कोठी में काम करती है . सुमन और उसके दोनों भाई सुबह होते ही सड़क पर कचरा बीनने आते है .सुबह क्या मुंह अँधेरे ही निकलते हैं . घंटाघर की घड़ी तब साढ़े चार या हद से हद पांच बज रहे होते हैं . सड़क पर गिरी बोतलें ,खाली डिब्बे गत्ते के कार्टन ,सब सधे हाथों से साथ के बोरे में समाते चले जाते है .हाथ तेज ,नजरें उससे भी तेज चल रही होती हैं .जितनी जल्दी चुना जा सके उतना अच्छा . ठीक छह बजते ही झाड़ू देने वाले माँ बेटा आ जायेंगे .फिर उन्हें घर लौटना होगा क्योंकि उसके बाद के सारे कचरे पर गोबिंद का हक हो जाता है . कचरे का बोरा लेकर वे कबाड़ी मोहन के डेरे पर जाते है .उस दिन का सामान ढेर कर सवालिया नजरों से मोहन को देखते है .मोहन तराजू पर तौलता है और कुछ रूपये उनके हाथ पर रख देता है .रूपये लेकर बच्चे रौनक की दूकान पर जाते है .दाल चावल या आटा जो मिल जाए जितना मिल जाए लेकर घर झुग्गी में लौटते है चूल्हा जलता है खाना बनता है थोडा थोडा खाकर बच्चे स्कुल चले जाते हैं . यह उनका रोज़ का नियम है .सर्दी गर्मी बरसात कभी कोई फर्क नहीं . फर्क सिर्फ इतना कि आज सुमन ने कबाड़ी के पास मेडिकल की किताबे देखी तो मांग ली और गजब ये कि कंजूस मोहन ने बिना कोई किन्तु परन्तु के वे सारी किताबें सुमन को दे भी दी हैं .सुमन उन किताबों को गले लगाये झुग्गी में जगमगाती आँखों में जगमगाते सपने सजाये बिलकुल उसी प्रकार बैठी है जैसे ग्यारहवी में मेडिकल सब्जेक्ट लेने के बाद बैठी थी . डाक्टर तो बनना ही है . चाहे साड़ी रात मोमबत्ती की रौशनी में पढना पड़े . जागती आँखों के सपने सुना है अवश्य पूरे होते हैं 

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