नरेंद्र कौर , हाँ यही नाम था उसका। मोटी तो नहीं पर गुथें बदन की मालकिन नरेंद्र कौर। कोई नाम छोटा कर बुलाने की कोशिश करता तो गुस्से से जलता अंगारा हो जाती। दो भाइयों की इकलौती बहन , माँ बाप से ज्यादा दादा दादी की लाडली।
पढ़ाई में बहुत अच्छे में तो नहीं पर गुजारे लायक नम्बर आ ही जाते। बारहवीं में अंग्रेजी में सबसे ज्यादा नम्बर आये तो पक्का हो गया कि अंग्रेजी ही पढ़ानी है बड़े होकर। एक दिन बी ए , बी एड करके सरकारी स्कूल में भैन जी हो गई।
घर में पहली तनख्वाह के पच्चीस सौ आये तो नरेंद्र कौर की शादी का जिक्र भी शुरू हुआ। पहला रिश्ता आया लड़का बैंक में नौकर था। पर बात सिरे न चढ़ी । लड़का नरेंद्र को पसन्द ही नहीं आया . बोली - कैसे चपर चपर खाता है और हंसता तो पूरा मुँह खोल के है . मैंने नई करना इससे ब्याह। घर वाले बोले कोई बात नहीं। रिश्तों की क्या कमी हमारी नरेंद्र कौर को। एक रिश्ता आता एक रिश्ता जाता। कोई लड़का काल था। कोई लम्बा नहीं था और एक लड़का तो इसलिए नापसन्द हो गया कि उसने पहला सेंटेंस जो बोला कितना गलत था। फिर एक दिन सुरेंदर को एक लड़का कुछ कुछ ठीक सा लगा तो लड़के ने कद कम होने की बात कह के रिश्ते से मन कर दिया
दादी ने बात सम्भालने की कोशिश भी की। कम कहाँ जी पूरे पंज फुट तिन इंच है जी कद। पर लड़के का कद था छः फुट। सो इस बार भी बात बनते बनते रह गई। धीरे धीरे साल बीत ते गए। नरेंद्र कौर बत्तीस पार कर गई । रिश्तों की तलाश और तेजी से शुरू हुई। अब रिश्तेदारों ने विधुर और तलाक शुदा पुरुषों के रिश्ते जुटाने शुरू किये क्योंकि इस उम्र तक का कोई लड़का कुंवारा बिरादरी में मिलना तो असम्भव ही था। करते करते जब सैंतीस भी पार हो गए तो माँ बाप की बैचैनी बढ़ी। पर एक दिन स्वयम नरेंद्र कौर ने इस सारी प्रक्रिया पर रोक लगा कर अध्याय को हमेशा हमेशा के लिए बन्द कर दिया। उसने दो गरीब बच्चों की देखभाल और शिक्षा का सारा जिम्मा लेकर उनकी जिंदगी सँवारने का जिम्मा लिया है।
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