उसने कक्षा में प्रवेश किया। सब उसे ही देखने के लिये मुङ गए.।गोरा चिट्टा रंग,तीखी नाक, छोटी पर कुछ बोलती सी आँखेँ,घुघराले बालोँ को कस के दो चोटियो में समेट दिया था। विमी मैडम ने आँख उठा कर देखा और वह चालू हो गई - मेरा नाम है छमा । मैम ने रजिस्टर में लिखा-क्षमा। न जी न मेरा नाम तो छमा है जी । सारी लङकियाँ हँस पङी थी। पर शाम होते होते पूरी क्लास जान गई थी कि वह ओम शर्मा के बेटे जयेश की इकलौती साली है। वो तो जीजी माँ बनने वाली है इसलिए आना पङा। पहले जीजी बीमार हो चुकी है न वरना वह यहाँ क्यों आती । कि जीजा जी उसे बहुत प्यार करते हैं कि जीजी भी उसे प्यार करती है पर कभी कभी डाँट देती है ।जीजी की सास बहुत खराब है, उन्हे सीधा करना पङेगा।
और अगले ही वह दस परांठे और ढेर सारा अचार ले आई थी। ये क्या इत्ता सारा ,कौन खाएगा ये सब । तुम सब और वह खिलखिला कर हँस पङी और फिर आगे की कहानी यह कि रात दाल ज्यादा बन गई थी तो दीदी की बुढिया सास देर तक बडबडाती रही थी । आज से तुम पाँच लोग खाना मत लाना ,तुम्हारा खाना मैं लाऊँगी ।और अगले डेढ साल तक उन पाँचो हरिजन सखियो का खाना वह खुद बना कर लाती रही ।जीजी की सास से सुलह तीसरे ही दिन हो गई थी हर रोज वे उसे एक रुपया देती जिस की टाफियाँ, इमली की दावत पूरी कक्षा की होती । उसने स्वेच्छा से जीजी के घर का सारा काम सँभाल लिया था ।
खेल के मैदान में वह सब से आगे रहती तो पढाई में भी बढिया कर रही थी । अब उसकी बातों में बुढिया जिसे वह मौसी कहती थी के साथ साथ भानजे रवि की शरारतों का भी जिकर् होता । इस सब में दो साल कैसे निकल गए, पता ही चला । दसवीं की परीक्षाएँ शुरू होने वाली थी कि एक दिन जीजी और जीजाजी मिठाई लेकर स्कूल आए ।क्षमा की शादी तय हो गई थी। परीक्षा समाप्त होते ही छमा डोली मे ससु राल चली गई। उसकी सुघडता दॆख जीजी की ममिया सास ने अपनॆ वकील बेटे के लिए छमा को माँग लिया था ।
उसके बाद छमा से कोई संपर्क नहीं है पर मैं जानती हूँ कि अपनी कर्मठता और सबको अपना बनाने की कला से उसने सब का मन जीत लिया होगा
और अगले ही वह दस परांठे और ढेर सारा अचार ले आई थी। ये क्या इत्ता सारा ,कौन खाएगा ये सब । तुम सब और वह खिलखिला कर हँस पङी और फिर आगे की कहानी यह कि रात दाल ज्यादा बन गई थी तो दीदी की बुढिया सास देर तक बडबडाती रही थी । आज से तुम पाँच लोग खाना मत लाना ,तुम्हारा खाना मैं लाऊँगी ।और अगले डेढ साल तक उन पाँचो हरिजन सखियो का खाना वह खुद बना कर लाती रही ।जीजी की सास से सुलह तीसरे ही दिन हो गई थी हर रोज वे उसे एक रुपया देती जिस की टाफियाँ, इमली की दावत पूरी कक्षा की होती । उसने स्वेच्छा से जीजी के घर का सारा काम सँभाल लिया था ।
खेल के मैदान में वह सब से आगे रहती तो पढाई में भी बढिया कर रही थी । अब उसकी बातों में बुढिया जिसे वह मौसी कहती थी के साथ साथ भानजे रवि की शरारतों का भी जिकर् होता । इस सब में दो साल कैसे निकल गए, पता ही चला । दसवीं की परीक्षाएँ शुरू होने वाली थी कि एक दिन जीजी और जीजाजी मिठाई लेकर स्कूल आए ।क्षमा की शादी तय हो गई थी। परीक्षा समाप्त होते ही छमा डोली मे ससु राल चली गई। उसकी सुघडता दॆख जीजी की ममिया सास ने अपनॆ वकील बेटे के लिए छमा को माँग लिया था ।
उसके बाद छमा से कोई संपर्क नहीं है पर मैं जानती हूँ कि अपनी कर्मठता और सबको अपना बनाने की कला से उसने सब का मन जीत लिया होगा
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